मिट गया गुलशन हमारा,
वो नजारे ना रहे !
हम तो हम ही हैं,
मगर अब वो,
हमारे न रहे !!
मिट गया गुलशन हमारा .. !!
एक माली ने उजारा,
मेरा प्यारा चमन!
कर दिया कंगाल,
लूटा दिल का चैन-ओ-अमन!!
कौन सी किसकी खता की,
ये सजा हम पा रहे !
मिट गया गुलशन हमारा... !!
ऐ फिजां तुझे है पता क्या,
मेरा हाल-ऐ-जिगर !
है कयामत आने वाली,
थोडी देर ठहर !!
जी रहा जिसके लिए,
अब वो सहारे न रहे !
मिट गया गुलशन हमारा ... !!
ऐ सुनहरे फूल! मुझसे,
है बता क्या वास्ता ?
क्यूँ सरेआम रोकते हो,
तुम हमारा रास्ता ?
यूँ निगाहों में समा ,
कर क्यूँ हमें तड़पा ?
मिट गया गुलशन हमारा ... !!
- करण समस्तीपुरी
Tuesday, September 23, 2008
Thursday, August 28, 2008
कब तक बैठोगे मौन तपस्वी?
कब तक बैठोगे मौन तपस्वी?
अब अपनी आँखें तो खोल !
बहुत हो चुका धैर्य प्रदर्शन,
बोल क्रांति के तीखे बोल !!
रे सतत समाधिलीन योगीश्वर,
जाग जाग अब शीघ्र जाग !
खींच खड़ग शान्ति मयान से,
खेल अराती रक्त से फाग !
शत्रु की कलुषित शक्ति को,
तुम तलवार तुला पे तोल,
बहुत हो चुका धैर्य प्रदर्शन,
बोल क्रांति के तीखे बोल !
केसरिया क्यारी काश्मिरी,
हो रही रक्त से आज लाल !
लाचार मनुजता सिसक रही,
डस रहे दनुज के विषम व्याल !
धर गरूर रूप दे त्रान इन्हे,
मांग रही माँ दूध का मोल !
बहुत हो चुका धैर्य प्रदर्शन,
बोल क्रांति के तीखे बोल !!
योग-मुद्रा में तुम हो मस्त !
हो रही मातृभूमि त्रस्त !!
हे धीर-वीर कर के विचार,
ध्यान त्याग, धर सस्त्र हस्त !!
कपटी-कुंजर की सेना में,
तुम मृगराज सरीखे डोल !
बहुत हो चुका धैर्य प्रदर्शन,
बोल क्रांति के तीखे बोल !!
उर प्रजातंत्र का घायल है !
फिर भी तू शान्ति का कायल है !!
हाथों में है चूडी कंगन !
या पांव में तेरे पायल है !!
स्मरण सौर्य आर्यों का कर,
दे बिखरा सस्त्र- छटा अनमोल !
बहुत हो चुका धैर्य प्रदर्शन,
बोल क्रांति के तीखे बोल !!
- करण समस्तीपुरी
अब अपनी आँखें तो खोल !
बहुत हो चुका धैर्य प्रदर्शन,
बोल क्रांति के तीखे बोल !!
रे सतत समाधिलीन योगीश्वर,
जाग जाग अब शीघ्र जाग !
खींच खड़ग शान्ति मयान से,
खेल अराती रक्त से फाग !
शत्रु की कलुषित शक्ति को,
तुम तलवार तुला पे तोल,
बहुत हो चुका धैर्य प्रदर्शन,
बोल क्रांति के तीखे बोल !
केसरिया क्यारी काश्मिरी,
हो रही रक्त से आज लाल !
लाचार मनुजता सिसक रही,
डस रहे दनुज के विषम व्याल !
धर गरूर रूप दे त्रान इन्हे,
मांग रही माँ दूध का मोल !
बहुत हो चुका धैर्य प्रदर्शन,
बोल क्रांति के तीखे बोल !!
योग-मुद्रा में तुम हो मस्त !
हो रही मातृभूमि त्रस्त !!
हे धीर-वीर कर के विचार,
ध्यान त्याग, धर सस्त्र हस्त !!
कपटी-कुंजर की सेना में,
तुम मृगराज सरीखे डोल !
बहुत हो चुका धैर्य प्रदर्शन,
बोल क्रांति के तीखे बोल !!
उर प्रजातंत्र का घायल है !
फिर भी तू शान्ति का कायल है !!
हाथों में है चूडी कंगन !
या पांव में तेरे पायल है !!
स्मरण सौर्य आर्यों का कर,
दे बिखरा सस्त्र- छटा अनमोल !
बहुत हो चुका धैर्य प्रदर्शन,
बोल क्रांति के तीखे बोल !!
- करण समस्तीपुरी
Wednesday, August 27, 2008
कल्पना एक बड़ी- करण समस्तीपुरी
मन मन्दिर के मृदुल सतह में,
पली कल्पना एक बड़ी,
कल्प लोक से उतर धरा पर
आयी हो तुम कौन परी?
अकथ प्रशंसित दिव्या सुवासित,
उस असीम की जादूगरी,
कल्प लोक से उतर धारा पर
आयी हो तुम कौन परी?
रवि की प्रथम रश्मि से सुरभित,
जैसे तरुण अरुण जलजात,
परम रम्य विधु-वादन मनोहर,
और सुकोमल सुंदर गात,
ब्रह्मानंद सरिस हो तुम,
प्रति अंग पीयूष पराग भरी,
कल्प लोक से उतर धारा पर,
आयी हो तुम कौन परी?
आयी हो तुम किस गिरी सर से,
भूतल, घन, वन या अम्बर से,
लाई हो क्या वर इश्वर से,
कुछ तो कह अभिराम अधर से,
सार सरस निज शीघ्र बताओ,
बीते न अनमोल घड़ी,
कल्प लोक से उतर धरा पर,
आयी हो तुम कौन परी?
रति सम सुंदर, सत्य सती सम,
वैभव विष्णु प्रिया सी,
शील गुणों में शारद जैसी,
सबल शैल तनया सी,
क्षमाशीलता वसुधा जैसी,
निर्मल जैसे देवसरी,
कल्प लोक से उतर धारा पर,
आयी हो तुम कौन परी?
अधरों पर पुष्प का हास रहे,
कर्मों में मधुर सुवास रहे,
पड़े न दुःख की परछाईं,
नयनों में दिव्य प्रकाश रहे,
किसलय के कोमल अंचल में,
रहो सदा तुम हरी-भरी,
कल्प लोक से उतर धारा पर,
आयी हो तुम कौन परी?
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